असम की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम ने सियासी गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है।
कांग्रेस छोड़ने के बाद प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष Bhupen Kumar Borah की केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah से मुलाकात ने कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है। मुलाकात के तुरंत बाद आया उनका एक संक्षिप्त लेकिन अर्थपूर्ण पोस्ट “32 साल बनाम 32 घंटे अंतर स्पष्ट” — राजनीतिक संदेशों के कई मायने निकाल रहा है।

तीन दशक तक कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले बोरा ने महज़ 32 घंटों के भीतर जिस तेज़ी से नई राजनीतिक सक्रियता दिखाई, वह सवाल खड़े कर रही है। क्या यह कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और अवसरों को लेकर असंतोष का संकेत है? क्या पार्टी अपने वरिष्ठ नेताओं को अपेक्षित मंच और सम्मान देने में चूक रही है? या फिर बदलते राजनीतिक समीकरण नेताओं को नए विकल्प तलाशने पर मजबूर कर रहे हैं?
असम की सियासत में यह घटनाक्रम केवल एक नेता का व्यक्तिगत निर्णय भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे व्यापक राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। क्या यह कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का समय है? क्या भाजपा के लिए यह रणनीतिक बढ़त साबित होगी? और सबसे अहम,क्या इस फैसले का असर आने वाले समय में असम की ज़मीनी राजनीति पर साफ दिखाई देगा?

संपादक की नजर में, यह घटनाक्रम सिर्फ दल-बदल की कहानी नहीं, बल्कि उस बदलते राजनीतिक मनोविज्ञान का प्रतिबिंब है, जिसमें समय, अवसर और पहचान की राजनीति नई परिभाषाएं गढ़ रही है—तो क्या ‘32 साल बनाम 32 घंटे’ की यह पंक्ति असम की सियासत का अगला अध्याय लिखने जा रही है?
