“पत्रकार के सवाल करने में हमला, सिस्टम खामोश,जवाबदेही किसके पास है और जिम्मेदारी किसकी ?”

समाचार/विश्लेषण:

छत्तीसगढ़। लोकतंत्र की असली पहचान उसकी संस्थाओं से नहीं, बल्कि उन आवाज़ों से होती है जो बेखौफ होकर सवाल पूछती हैं। जब यही आवाज़ें—खासतौर पर पत्रकारिता के माध्यम से उठने वाली—दबाव, दुर्व्यवहार या मारपीट का सामना करने लगें, तो यह किसी एक घटना का दायरा पार कर व्यवस्था की सोच और प्राथमिकताओं का आईना बन जाती है।

हालिया घटना, जिसमें एक पत्रकार के साथ कथित मारपीट और अभद्र व्यवहार हुआ, केवल एक पेशेवर जोखिम नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन के लिए गंभीर संकेत है। चौथा स्तंभ, जिसे जनता की आवाज़ और सत्ता की निगरानी का माध्यम माना जाता है, यदि उसी पर इस प्रकार का प्रहार हो, तो यह सीधे-सीधे जवाबदेही के ढांचे को कमजोर करता है।

घटना से भी बड़ा सवाल है—उसके बाद का सन्नाटा।
न स्पष्ट प्रतिक्रिया, न त्वरित कार्रवाई, न ही कोई ठोस संदेश—यह चुप्पी अपने आप में कई अर्थ समेटे हुए है। क्या यह मौन सहमति है? या फिर यह उस असहजता का परिणाम है, जहां सवालों का सामना करने के बजाय उन्हें टाल देना अधिक सहज विकल्प बन चुका है?

पत्रकारिता का उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि तथ्यों के साथ सवाल रखना और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। लेकिन जब सवाल पूछने की प्रक्रिया ही असुरक्षित हो जाए, तो इसका सीधा असर आम नागरिक के अधिकारों पर पड़ता है। क्योंकि पत्रकार की आवाज़, दरअसल उसी आम नागरिक की आवाज़ का विस्तार होती है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम पहलू यह भी है कि क्या ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई स्पष्ट नीति,

दिशा-निर्देश या जवाबदेही तय करने की व्यवस्था मौजूद है ?


यदि है, तो उसका पालन क्यों नहीं दिखता ?


और यदि नहीं है, तो क्या भविष्य में इसे सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस पहल की जा रही है?

राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर यह समय केवल प्रतिक्रिया देने का नहीं, बल्कि स्पष्ट रुख दिखाने का है। यह बताने का है कि क्या व्यवस्था संवाद को प्राथमिकता देगी या दबाव को? क्या सवालों को लोकतंत्र की ताकत माना जाएगा या असुविधा?


आज आवश्यकता है—
✔️ पत्रकारों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट और कड़े प्रोटोकॉल की
✔️ जवाबदेही तय करने की पारदर्शी व्यवस्था की
✔️ ऐसे मामलों में त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई की
✔️ और सबसे बढ़कर, संवाद की उस संस्कृति की, जहां सवालों को सम्मान मिले, न कि प्रतिरोध

क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं है—यह निरंतर संवाद, असहमति और जवाबदेही का जीवंत तंत्र है।

और जब इस तंत्र में सवालों की जगह सन्नाटा ले लेता है, तो खतरा केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं रहता—वह पूरे समाज को प्रभावित करता है।
अंततः सवाल वही है—

क्या व्यवस्था इस संकेत को समझेगी, या फिर खामोशी ही नई परंपरा बन जाएगी?

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